जयपुर. राजधानी में मेट्रो परियोजना के जरिए वाहवाही पाने की जल्दबाजी सरकारी खजाने को 500 करोड़ का फटका लगा गई। यात्रीभार को आधार बनाने की बजाय गलत रूट चुनकर मेट्रो चलाने के कारण राज्य के खजाने को यह चपत लगी है। जबकि नगरीय विकास विभाग के तत्कालीन प्रमुख शासन सचिव ने मानसरोवर से चांदपोल तक मेट्रो फेज 1-ए अव्यावहारिक होने की आशंका जता दी थी। जिस अनुमानित यात्रीभार को आधार बनाकर मेट्रो के पिलर खड़े किए, उस अनुमान को तब ही अव्यावहारिक बता दिया गया था।
सार्वजनिक व निजी परिवहन के यात्रियों को जोड़ लिया जाए तो भी 25 से 30 हजार यात्री से ज्यादा नहीं मिल पाने की आशंका जताई गई थी। जबकि डीपीआर में 1.21 लाख यात्री प्रतिदिन बताए गए। मौजूदा यात्रीभार और किराया राशि से यह आंशका सही ही साबित हुई है। अब कैग की रिपोर्ट में खुलासा हुआ तो सरकार से नौकरशाह तक सभी संबंधित अफसर कठघरे में आ गए हैं। तत्कालीन सरकार ने डीपीआर में हर दिन अनुमानित 2.1 लाख यात्रीभार फेज 1-ए व 1-बी होने का दावा कर करोड़ों का प्रोजेक्ट खड़ा कर दिया। हकीकत यह है कि वर्तमान में यह 22 हजार पर आ गिरा है।...
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