Home Top Ad

Responsive Ads Here

राजस्थान: जो बना खेल मंत्री, वो हारा चुनावी मैच

Share:





राजस्थान विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है और पार्टियों ने अपने सिपाही भी रण में उतार दिए हैं. इस सियासी रण में कई मौजूदा मंत्री भी एक बार फिर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. लेकिन राजस्थान में एक ऐसा संयोग है, जिसकी वजह से चुनाव नतीजों के दिन सबकी निगाहें मौजूदा खेल मंत्री की सीट पर भी रहती है. राजस्थान में गजेंद्र सिंह खींवसर राज्य के खेल और वन मंत्री हैं, जो लोहावट से विधायक हैं.

दरअसल, राजस्थान की सियासत में ऐसा माना जाता है कि जो मौजूदा खेल मंत्री होता है, वो भले ही कितना दिग्गज हो उसे हार का सामना करना पड़ता है. ऐसा पिछले कई सालों से हो रहा है और हर बार खेल मंत्री चुनावी मैदान में हार ही जाता है. साल 2003 में आई वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में दो खेल मंत्री बनाए तो उन दोनों को ही हार नसीब हुई. जानते हैं ऐसा कब से हो रहा है और कौन-कौन से नेता इसके गवाह बने हैं...

मांगीलाल गरासिया

मंगीलाल गरासिया के उदयपुर की गोगुंदा सीट से तीन बार चुनाव जीत चुके हैं और 2008 में वे प्रदेश के खेल मंत्री थे. 2013 में भी वे तीन बार विधायक रहने के अनुभव के साथ मैदान में उतरे, लेकिन उन्हें प्रताप भील से चुनाव हारना पड़ा. इस हार के साथ ही यह मिथक सच साबित हुआ.

युनूस खान

इससे पहले युनूस खान का नंबर था. युनूस खान 2003 में पहली बार विधानसभा पहुंचे और उन्हें वसुंधरा सरकार में खेल मंत्री बनाया गया. हालांकि वे पूरे पांच साल खेल मंत्री नहीं थे और उनके बाद प्रताप सिंह सिंघवी को खेल मंत्री बनाया गया. वो भले ही कुछ महीने खेल मंत्री रहे, लेकिन 2008 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

प्रताप सिंह सिंघवी

वसुंधरा राजे 2003 की सरकार में युनूस खान के बाद प्रताप सिंह सिंघवी को खेल मंत्री बनाया गया. प्रदेश के दिग्गज नेताओं में से एक सिंघवी पर भी खेल मंत्री का 'काला जादू' चल गया और उन्हें भी 2008 में हार का सामना करना पड़ा. अभी प्रताप सिंह सिंघवी बारां के छबड़ा से विधायक हैं.

मास्टर भंवरलाल

मास्टर भंवरलाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से एक है. 1998 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की और अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बनाई. गहलोत सरकार में ही मास्टर भंवरलाल को खेल विभाग का जिम्मा दिया गया. लेकिन इससे अगले चुनाव में ही भंवरलाल को हार का सामना करना पड़ा.

बता दें कि कांग्रेस नेता अश्क अली टांक के साथ भी ऐसा हुआ था, जब 1985 में वे फतेहपुर से विधायक बने तो उन्हें खेल मंत्री बनाया गया था, लेकिन अगले चुनाव में ही जनता ने उनपर भरोसा नहीं किया. इस बार इस मिथक का सामना गजेंद्र सिंह खींवसर को करना है, देखते हैं यह क्रम अब जारी रहता है या खेल मंत्री का खेल सियासत में भी चल जाता है....

  

from hindi news https://ift.tt/2Psu1ew
via IFTTT