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आंदोलनरत किसानों की हुंकार: चैन से मत बैठिए सरकार, हम फिर आ रहे हैं

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले किसान अपनी मांगों को लेकर मंगलवार को दिल्ली पहुंचे. लाठियां खाईं, पड़ाव डाला फिर सरकार के साथ मध्यस्थता भी हुई. अंतत: उन्हें खाली हाथ वापस जाना पड़ा. किसानों के वापस जाने पर सरकार ने राहत की सांस जरूर ली होगी, लेकिन यह राहत कुछ ही दिनों की है. क्योंकि पूरे देश में पदयात्रा करते हुए किसान नवंबर में कृषि पर संसद के विशेष सत्र की मांग को लेकर फिर राष्ट्रीय राजधानी पहुंचने वाले हैं.

इसी साल मार्च के महीने में हफ्ते भर पदयात्रा कर 40,000 हजार किसान और मजदूर नासिक से मुंबई अपनी मांगों को लेकर पहुंचे थे. पहले तो महाराष्ट्र सरकार इन पदयात्रियों को 'अर्बन माओवादी' बता कर नकारती रही. लेकिन इन पदयात्रियों के मुंबई पहुंचकर विधानसभा घेराव से निकलने वाले संदेश को देखते हुए सरकार के तेवर नरम पड़े और सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई. किसानों ने राज्य सरकार को कर्ज माफी समेत किसानों की अन्य मांगें मानने को मजबूर कर दिया था.

सभ्यता का संकट

वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ का मानना है कि भारत का कृषि संकट अब कृषि से आगे निकल कर पूरे समाज का संकट हो गया है. साईनाथ का कहना है कि हो सकता है कि यह संकट हमारी सभ्यता के सबसे बड़े संकट में परिवर्तित हो जाए, क्योंकि धरती की सबसे बड़ी आबादी (छोटे किसान और मजदूर) अपनी आजीविका को बचाने का निर्णायक संघर्ष कर रहे हैं. पिछले बीस साल में 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की है. लेकिन देश के बड़े अर्थशास्त्री इस संकट को नकार रहे हैं.

साईनाथ का कहना है कि पिछले दो साल से राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने किसानों की आत्महत्या के आंकड़े जारी करने बंद कर दिए हैं. राज्यों के सरकारी आंकड़ों में किसानों की आत्महत्या को कमतर करके बाताने की होड़ लगी है. जबकि आत्महत्याओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है.

खेती छोड़ रहे हैं किसान

साल 2011 की जनगणना के अनुसार पिछले 10 सालों में शायद आजाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ा संकट-संचालित पलायन हुआ. जिसमें लाखों ग्रामिणों ने शहरों और कस्बों में रोजगार की आस में पलायन किया. 2011 की जनगणना के अनुसार किसानों की संख्या में 1991 की जनगणना के मुताबिक 1.5 करोड़ की कमी आई है. जिसके साफ मायने हैं कि लोग खेती-किसानी छोड़कर अन्य रोजगार में आय की संभावनाएं तलाश रहे हैं.

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसानों के संघर्ष के बाद देश के 150 से अधिक किसान संगठनों के गठबंधन से बनी आखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) के बैनर तले  देश भर से लगभग 10 लाख किसान 28-30 नवंबर के बीच दिल्ली में इकट्ठा होंगे. ये किसान राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश के 8 रास्तों से दिल्ली में दाखिल होंगे. बता दें कि यह समय संसद के शीतकालीन सत्र का भी होता है, लिहाजा इनकी मांग है कि इस दौरान कृषि संकट पर समर्पित संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र 21 दिनों के लिए बुलाया जाए.

अपनी मांगों को लेकर संगठन ने देश के राष्ट्रपति से अपील भी की है. संगठन द्वारा प्रस्तावित 21 दिनों के संसद के विशेष सत्र का प्रारूप इस प्रकार है: 

3 दिन: स्वामीनाथन आयोग के रिपोर्ट पर चर्चा: एम एस स्वामीनाथन समिति ने कृषि पर साल 2004 से 2006 के दौरान पांच रिपोर्ट दी थी. जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा फसलों की पैदावार, मुनाफा, तकनीक बढ़ाने पर जोर दिया गया. साथ ही मौसम की मार से किसानों को बचाने के लिए उपयुक्त सुरक्षा दी जाए.

3 दिन: जन सुनवाई: संसद के सेंट्रल हॉल में उन किसानों की पीड़ा सुनी जाए जिनकी जिंदगियां इस कृषि संकट में तबाह हो गईं. इनकी मांग है कि यह संकट महज कृषि तक सीमित नहीं है. निजीकरण के कारण शिक्षा और इलाज गांव के गरीबों को महंगा पड़ रहा है. इनका मानना है कि स्वास्थ्य पर पड़ने वाला खर्च सबसे तेजी से बढ़ा है जो ग्रामिणों के कर्ज का प्रमुख अंग है.

3 दिन: कर्ज संकट पर चर्चा: जो किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण है. जिसमें लाखों परिवारों की जिंदगियां तबाह हो गईं.

3 दिन: जल संकट पर चर्चा: यह संकट बाढ़ और सूखे से कहीं ज्यादा है. संगठन का आरोप है कि सरकार तर्कसंगत मूल्य निर्धारण की आड़ में पानी का निजीकरण कर रही है. इनकी मांग है कि पीने के पानी का अधिकार संविधान के मौलिक अधिकार में शामिल किया जाए. और जीवन देने के संसाधनों का निजीकरण बंद हो. जिसमें इन संसाधनों पर समाज का नियंत्रण हो विशेषकर भूमिहीनों का.





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