भारत में चुनाव किसी भी राज्य मे हों जातियों की भूमिका अहम रहती है. राजस्थान भी इससे अछूता नहीं है. साल 2003 और 2013 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जाति कार्ड खेलते हुए कहा था कि वो जाटों की बहू हैं, राजपूतों की बेटी हैं और गुर्जरों की समधिन हैं. इन तीनों जातियों की राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका रहती है, जबकि राजपूत और जाट परस्पर विरोधी माने जाते हैं.
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र और झालावाड़ से सांसद दुष्यंत सिंह ने भी सोशल इंजीनियरिंग के गुर अपनी मां से सीख लिए हैं. यही वजह है कि दुष्यंत अपनी पत्नी निहारिका को गुर्जर बहुल सीटों पर प्रचार के लिए भेज रहे हैं, क्योंकि वो इसी जाति से आती हैं. राज्य ने पिछले कुछ समय से जाटों की ओबीसी कैटेगरी में शामिल करने की मांग और गुर्जरों की 5 फीसदी आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन देखे हैं.
जातीय समीकरण और उनका महत्व
राजस्थान में 89 फीसदी आबादी हिंदू, 9 फीसदी मुस्लिम और 2 फीसदी अन्य धर्म के लोग हैं. अनुसूचित जाति की आबादी 18 फीसदी, अनुसूचित जनजाति की आबादी 13 फीसदी, जाटों की आबादी 12 फीसदी, गुर्जर और राजपूतों की आबादी 9-9 फीसदी, ब्राह्मण और मीणा की आबादी 7-7 फीसदी है. इस लिहाज से किसी भी दल को सत्ता में आने के लिए ओबीसी वोट को साधना बेहद जरूरी हो जाता है. यही वजह है कि भले ही राजनीतिक दल विकास, लोक कल्याण के नाम पर प्रचार करते हैं लेकिन टिकट का वितरण जाति के आधार पर ही होता है.
आप इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि एक तरफबीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि बीजेपी जाति की राजनीति नहीं, बल्कि विकास की राजनीति करती है. तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, राजपूत समाज के मंत्रियों की अलग से बैठक बुलाकर राजपूतों का विश्वास जीतने की रणनीति तैयार करती हैं. राजे ने राजपूत नेताओं को जमीन पर काम कर बेरोजगारी और आरक्षण के मुद्दे पर उनकी नाराजगी दूर करने की जिम्मेदारी दी है.
कहां-कहां कौन सी जातियां हावी
राजस्थान के उत्तरी हिस्से में मारवाड़ का कुछ हिस्सा और शेखावाटी क्षेत्र जाट बहुल है, दक्षिणी राजस्थान गुर्जर और मीणा बहुल है. हाड़ौती क्षेत्र जिसमें कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ जिला शामिल है ब्राह्मण, वैश्य और जैन बहुल है. मत्स्य क्षेत्र में आबादी मिश्रित है, जबकि मध्य राजस्थान जिसमें जोधपुर, अजमेर, पाली, टोंक, नागौर जिले आते हैं, वहां मुस्लिम, मीणा, जाट और राजपूतों का प्रभाव है. मेवाड़-वागड़ क्षेत्र यानि उदयपुर संभाग आदिवासी बहुल क्षेत्र है. राजस्थान विधानसभा में इस समय 27 राजपूत, 31 जाट, और 15 गुर्जर विधायक हैं.
राजस्थान में बीजेपी राजपूतों (स्वतंत्र पार्टी के जमाने से) और ओबीसी में ज्यादा लोकप्रिय रही है, जबकि कांग्रेस ब्राह्मण, जाट, मुस्लिम, गुर्जर, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में ज्यादा लोकप्रिय मानी जाती रही है. लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरण और हर 5 साल में सरकार बदलने की परिपाटी के चलते धीरे-धीरे मतदाताओं के वोटिंग करने के तरीके में बदलाव आया है. जाट समुदाय जो पारंपरिक तौर पर कांग्रेस का समर्थक था, माली समुदाय से आने वाले अशोक गहलोत को 1998 और 2008 में मुख्यमंत्री बनाने के कारण कांग्रेस से दूर होता गया.
2018 का विधानसभा चुनाव कई मायनों में गुर्जर बनाम मीणा और राजपूत बनाम जाट माना जा रहा है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन जातियों ने एक साथ एक पार्टी को कभी वोट नहीं किया और पारंपरिक तौर पर यह दूसरे के विरोधी भी रहे हैं. इस साल की शुरुआत में जोधपुर के सोमारू गांव में जाटों ने कथित तौर पर राजपूतों के घरों को आग के हवाले कर दिया और लूटपाट की. सरकार की तरफ से संतोषजनक कार्रवाई नहीं करने के कारण बीजेपी को राजपूतों की नाराजगी का खामियाजा अजमेर और अलवर के लोकसभा उपचुनाव में भुगतना पड़ा.
छोटी आबादी वाली जातियों को एकजुट करने की राजनीति
हाल के चुनावों में देखा गया है कि छोटी आबादी वाले जाति समुदाय एकजुट होकर बड़ी और प्रभावी जातियों के असर को कम कर रहे हैं. ये मॉडल पूरे राज्य में परिलक्षित न होकर अलग-अलग इलाकों के हिसाब से तय होता है. मसलन किरोणी सिंह बैंसला गुर्जर, रैबारी और आरक्षण की मांग कर रहे राजपूतों को एकजुट करने में लगे हैं. ताकि प्रभावी जातियों के वर्चस्व को कम किया जा सके और राष्ट्रीय दलों को अपनी मांगों पर झुकने को मजबूर किया जा सके
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